JVD_9228.JPG

लोकनायक के आंदोलन की प्रासंगिकता

( 11 अक्टूबर लोकनायक जय प्रकाश नारायण जयंती पर)

लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में स्वतंत्रता के बाद देश ने अपने सबसे बड़े छात्र-युवा आंदोलनों में से एक देखा। यह आंदोलन केवल तत्कालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि देश के सार्वजनिक जीवन को नई दिशा देने का प्रयास भी था। जेपी के नेतृत्व में चले इस आंदोलन की ऐतिहासिक महत्ता को समझने के लिए इसकी तीन बड़ी विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

रचनात्मक दृष्टिकोण
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन की बुनियाद केवल विरोध पर नहीं बल्कि रचनात्मक परिवर्तन की आकांक्षा पर टिकी थी। सकारात्मक भाव था। सत्याग्रह था। व्यवस्था को नकारने का आग्रह नहीं बल्कि उसमें सुधार करने और सार्वजनिक जीवन को अधिक उत्तरदायी बनाने का विचार था। आंदोलन का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं था। वह सामाजिक और राजनीतिक जीवन में शुचिता, जवाबदेही और जनहित के मूल्यों को प्रतिष्ठित करना चाहता था। यही रचनात्मक दृष्टि उसे महज विरोध-प्रदर्शन से अलग करती थी।

लोकतंत्र
इस आंदोलन का दूसरा बड़ा गुण उसकी लोकतांत्रिक प्रकृति थी। व्यवस्था परिवर्तन के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाना और सवैधानिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना उसकी मूल विशेषताओं में शामिल था। आंदोलन की शक्ति जनभागीदारी, शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतांत्रिक चेतना में निहित थी। इस आंदोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं था। पक्का विश्वास था कि जनता की जागरूकता और संगठित जनमत के माध्यम से व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से यह आंदोलन केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा और उसकी संस्थागत शक्ति में भरोसे की अभिव्यक्ति था।

दलगत षड्यंत्र की राजनीति से ऊपर
इस आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में एक उसका दलगत राजनीति से ऊपर उठने का प्रयास था। इसकी प्रेरणा किसी राजनीतिक दल के तात्कालिक स्वार्थ, सत्ता प्राप्ति की रणनीति या राजनीतिक प्रपंच से नहीं उपजी थी। इसके केंद्र में युवा शक्ति की आकांक्षाएँ, सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता और सार्वजनिक जीवन में सुधार का संकल्प था। जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी और नैतिक नेतृत्व का आधार देने का प्रयास किया। यही कारण था कि यह आंदोलन किसी एक दल की राजनीतिक गतिविधि तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक-राजनीतिक चेतना का प्रतीक बना।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन की ये तीन विशेषताएँ आज भी प्रासंगिक हैं—रचनात्मकता, लोकतंत्र और दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर जनहित के लिए काम करने का संकल्प। किसी भी आंदोलन की सार्थकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह किसके विरोध में खड़ा है, बल्कि इससे तय होती है कि वह समाज को क्या सकारात्मक दिशा देता है ? परिवर्तन के लिए कौन-सा मार्ग अपनाता है और उसके पीछे कौन-सी प्रेरणा काम करती है ?

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत इसी कसौटी पर समझी जानी चाहिए। वह हमें याद दिलाता है कि युवा शक्ति का वास्तविक सामर्थ्य केवल असंतोष व्यक्त करने में नहीं, बल्कि रचनात्मक परिवर्तन का वाहक बनने में है; लोकतंत्र की शक्ति केवल विरोध में नहीं, बल्कि उसकी मर्यादाओं में विश्वास रखने में है; और जनांदोलन की विश्वसनीयता दलगत लाभ से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों की शुचिता से निर्मित होती है। यही लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन का स्थायी संदेश है।

RAJ 3

विपक्ष की विश्वसनीयता का संकट

भारत में विपक्ष आज गंभीर विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। लगातार जिस प्रकार के विषय, विचार और मुद्दे विपक्ष उठा रहा है, वे न तो तर्कसंगत हैं और न ही तथ्यपरक। आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं से लेकर आकांक्षी भारत की अपेक्षाओं और देश की नीतिगत चुनौतियों तक, विपक्ष प्रभावी भूमिका में दिखाई नहीं देता। जनता के वास्तविक प्रश्नों पर ठोस विकल्प देने के बजाय वह नैरेटिव की ऐसी आभासी लड़ाई में उलझा है, जिसकी बुनियाद कई बार तथ्यों से अधिक मात्र राजनीतिक आरोपों पर दिखाई देती है।लोकतंत्र में सरकारों की समीक्षा बहुत होती है लेकिन विपक्ष की नहीं।देश ने विपक्ष को संवैधानिक भूमिका सौंप रखी है। विपक्ष अपनी इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता । संकट तब और गहरा जाता है जब अपनी यह भूमिका निभाना तो दूर बल्कि विपक्ष का नेतृत्व हठधर्मी हो जाए एवं उसपर सामंती अहंकार सवार हो।देश को अराजकता पर धकेलने का प्रयास होता है।

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस स्वयं या विभिन्न दलों के समर्थन से केंद्र की सत्ता में रही। देश की आर्थिक नीतियों, बजट, प्रशासनिक व्यवस्था और विकास की दिशा तय करने में उसकी निर्णायक भूमिका रही। बीच में गैर-कांग्रेसी सरकारें भी आईं, लेकिन कई दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। इसलिए उसके लंबे शासन की उपलब्धियों के साथ उसकी विफलताओं और नीतिगत निर्णयों की जवाबदेही से भी उसे बचाया नहीं जा सकता। समय के साथ भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक अकर्मण्यता, नीतिगत असमंजस और नेतृत्व से जुड़े प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए। जनता के बीच असंतोष बढ़ा और कांग्रेस का राजनीतिक आधार कमजोर होता गया।

2014 में इस असंतोष ने निर्णायक रूप लिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और केंद्र में भाजपा नीत सरकार बनी। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जनता के बदलते रुझान का स्पष्ट संकेत था। यहीं से विपक्ष के सामने आत्ममंथन का अवसर था। चुनावी पराजय के कारणों को समझना, संगठन और नेतृत्व की कमियों को स्वीकार करना तथा जनता के सामने नई नीतियों और नए विकल्प के साथ जाना किसी भी लोकतांत्रिक दल का स्वाभाविक रास्ता होना चाहिए। विपक्ष के एक हिस्से ने इसके बजाय चुनावी जनादेश पर ही प्रश्न उठाने शुरू कर दिए। माइनॉरिटेरियन डेमोक्रेसी, पोस्ट ट्रुथ पॉलिटिक्स, मेनूफ़्रैक्चरड वेब जैसे शब्द गढ़ कर 2014 के जनादेश को झुठलाने का प्रयास हुआ।

बाद में EVM के बहाने नए जनादेश को ग़लत बताया जाने लगा। चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन गंभीर आरोपों को प्रमाणित करना भी उतना ही आवश्यक है। निर्वाचन आयोग ने EVM में कथित छेड़छाड़ को प्रदर्शित करने का अवसर राजनीतिक दलों को दिया। इसके बावजूद आज तक ऐसा कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया जिसने यह सिद्ध किया हो कि देश के चुनावों में EVM के माध्यम से व्यवस्थित रूप से जनादेश बदला गया। VVPAT और मतगणना की निर्धारित प्रक्रियाएँ चुनावी सत्यापन का हिस्सा हैं। क्या आज तक किसी भी मतदान केंद्र पर ईवीएम की गणना और वीवीपेट पर्ची की गणना में कोई अंतर पाया गया ? क्या इस बारे में कोई इसे गलत ठहराते हुए किसी प्रकरण पर न्यायालय ने कोई निर्णय दिया है ? प्रश्न EVM पर सवाल उठाने का नहीं, बल्कि उस सवाल को प्रमाणित करने का है। किसी आरोप को लगातार दोहराने से वह तथ्य नहीं बन जाता। लोकतंत्र में संदेह की जगह है, लेकिन संदेह को प्रमाण का स्थान नहीं दिया जा सकता।

अब इस बार चुनाव आयोग को ही संदिग्ध बनाने के कार्य किया जा रहा है। SIR के बहाने या कभी किसी अख़बार की खबर के आधार पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े कर एक संवैधानिक संस्था को बिना किसी साक्ष्य के संदिग्ध बनाकर स्वयं नेतृत्व और अपने दल की घोर पराजय से मुँह छिपाया जा रहा है। यहाँ तक कि इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

विपक्ष की समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। सरकार की नीतियों से असहमति उसका लोकतांत्रिक अधिकार और दायित्व है लेकिन केवल विरोध किसी राजनीतिक दल को विकल्प नहीं बनाता। आज का भारत आकांक्षी भारत है। जिसे नरेंद्र मोदी ने समझा है और उस ओर अपनी सरकार के तेजी से कदम बढ़ाये हैं। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनावी राजनीति और सरकार का विमर्श बदला है। नागरिक बेहतर सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा के साथ आधुनिक बुनियादी ढाँचा, तकनीक, निवेश के नए अवसर पर चर्चा करता है।

इन प्रश्नों पर विपक्ष की अपनी स्पष्ट नीति और रोडमैप क्या है। यह अधिक महत्वपूर्ण सवाल है। किसी सरकारी योजना को गलत बताने के साथ यह बताना भी जरूरी है कि गलती कहाँ है, उसका समाधान क्या है और सत्ता में आने पर उससे बेहतर क्या किया जाएगा। जनता केवल यह नहीं सुनना चाहती कि सरकार ने क्या गलत किया। वह यह भी जानना चाहती है कि विपक्ष क्या सही करेगा।

पिछले एक-डेढ़ दशक में विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा सरकार की नीतियों के विकल्प देने के बजाय नैरेटिव की राजनीति में अधिक सक्रिय दिखाई दिया है। चुनाव प्रक्रिया से लेकर संस्थाओं तक अनेक विषयों पर सवाल उठाए गए लेकिन आरोपों को प्रमाण और विरोध को वैकल्पिक नीति में बदलने का प्रयास उतना स्पष्ट नहीं दिखा।कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के लिए चुनौती अपने लंबे राजनीतिक अतीत का ईमानदार मूल्यांकन करने, पराजय के कारणों को स्वीकार करने और बदलते भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को पुनर्गठित करने की है।

भारत को मजबूत विपक्ष चाहिए। ऐसा विपक्ष जो सरकार से कठिन सवाल पूछे, उसकी कमियाँ उजागर करे लेकिन तथ्यों के साथ। ऐसा विपक्ष जो संस्थाओं पर प्रश्न उठाए लेकिन प्रमाण के साथ। ऐसा विपक्ष जो सरकार का विरोध करे तो उसके सामने बेहतर नीति और स्पष्ट विकल्प भी रखे। यह भाजपा ने किया है उन राज्यों में जहाँ विपक्ष में है वहाँ भी यही भूमिका निभा रही है।विपक्ष की असली लड़ाई किसी एक सरकार या किसी एक नेता के विरुद्ध नैरेटिव खड़ा करने की नहीं, अपनी विश्वसनीयता पुनः अर्जित करने होनी चाहिए।

जनादेश का सम्मान, अपनी पराजय का आत्ममंथन, आरोपों के स्थान पर प्रमाण, नैरेटिव के स्थान पर नीति और विरोध के स्थान पर विकल्प—यही किसी भी विपक्ष को जनता के बीच फिर से विश्वसनीय बना सकता है।लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। विपक्ष को तय करना होगा कि वह केवल सरकार का विरोध करना चाहता है या वास्तव में देश के सामने एक विश्वसनीय विकल्प बनना चाहता है।

WhatsApp Image 2026-10-10 at 14.37.44

सेवा से संकल्प तक:मोदी के 25 वर्ष

जनसेवा से राष्ट्रसेवा 

नरेंद्र मोदी जी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में सार्वजनिक जीवन के पच्चीस वर्ष पूरे होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। किसी नेता का ढाई दशक तक लगातार सार्वजनिक जीवन के केंद्र में रहना और अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना निश्चित ही अभिनंदन का विषय है। लेकिन इसे केवल इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति पच्चीस वर्ष तक सत्ता में रहा। समझने की जरूरत यह है कि इन ढाई दशकों में देश बदला, तकनीक बदली, परिस्थितियाँ बदलीं, सामाजिक चुनौतियाँ बदलीं, दुनिया बदली और लोगों की अपेक्षाएँ भी बदलीं। ऐसे समय में एक नेता का लगातार प्रासंगिक बने रहना निश्चित ही अध्ययन का विषय है। नरेंद्र मोदी जी के व्यक्तित्व को एक राजनेता और प्रशासक के नाते देखें तो प्रश्न उठता है कि आखिर वे कौन से गुण हैं, जिनके कारण वे इतने लंबे समय के बाद भी देश की राजनीति और जनचर्चा के केंद्र में बने हुए हैं?मेरी दृष्टि में इसका सबसे बड़ा कारण है – समय को समझना, समय के साथ बदलना और समय के अनुकूल निर्णय लेने का साहस।

समय को समझने वाला नेतृत्व

ढाई दशक पहले की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं। तकनीक पूरी तरह बदल गई है, समाज की आकांक्षाएँ बदली हैं, संचार के साधन बदले हैं, अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदला है और दुनिया की राजनीति भी बदल गई है।ऐसे में किसी नेता का एक ही तरीके से चलते रहना संभव नहीं है। नरेंद्र मोदी जी की विशेषता यह रही है कि वे लगातार समय के अनुकूल परिवर्तन करते रहे हैं। समाज का अध्ययन करते हैं, नई परिस्थितियों को समझते हैं और समय-समय पर नीतियों और नियमों में बदलाव करने से पीछे नहीं हटते।तकनीक को उन्होंने चुनौती के रूप में नहीं, अवसर के रूप में देखा। शोध और आविष्कार से पीछे हटने के बजाय उन्हें भारत की शक्ति बनाने का प्रयास किया। नई पीढ़ी के साथ संवाद किया, उसकी आकांक्षाओं को समझा और उन्हें पूरा करने का साहस दिखाया।

वैचारिक स्पष्टता के बीच नरेंद्र मोदी

किसी भी देश का नेतृत्व केवल योजनाएँ बनाने से नहीं होता। जब देश के भीतर और बाहर वैचारिक संघर्ष हो, तब नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा होती है।भारत ने लंबे समय तक ऐसी राजनीति भी देखी है जिसमें देश की समस्याओं को देखने का एक निश्चित वैचारिक चश्मा रहा। वामपंथी विचारधारा की धमाचौकड़ी ने भी लंबे समय तक देश के बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया। राष्ट्र, संस्कृति, विकास, गरीबी, सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को लेकर अनेक प्रकार के विमर्श खड़े किए गए। ऐसे वातावरण में नरेंद्र मोदी जी ने एक स्पष्ट वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की- राष्ट्र प्रथम, विकास के साथ गरीब कल्याण, मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीक के साथ आधुनिक भारत और अपनी संस्कृति के प्रति आत्मविश्वास। यह वैचारिक स्पष्टता केवल भाषणों में नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं में दिखाई देती है। जब देश के भीतर और बाहर तमाम प्रकार की उलझनें हों, संघर्ष दिखाई पड़ते हों और दुनिया स्वयं भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही हो, तब एक वैचारिक रूप से स्पष्ट और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला नेता देश के सामने समाधान के रूप में प्रस्तुत होता है। आज दुनिया भारत को केवल एक विकासशील देश के रूप में नहीं देखती। भारत अपनी बात कहने वाला, अपने हितों की रक्षा करने वाला और वैश्विक समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाने की क्षमता रखने वाला देश बनकर सामने आया है।

आर्थिक महाशक्ति बनता भारत

भारत की इस बदलती भूमिका का सबसे बड़ा आधार उसकी आर्थिक शक्ति है। भारत आर्थिक रूप से तेज गति से आगे बढ़ रहा है। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदमताल कर रहा है। मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर, डिजिटल इकोनॉमी, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप और नए उद्योगों में भारत अपनी नई पहचान बना रहा है। दुनिया भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक शक्ति और भविष्य की महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में देख रही है। भारत का आर्थिक विकास केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। इसके पीछे बदलती हुई मानसिकता भी है—एक ऐसा भारत जो अवसर खोज रहा है, उद्यम कर रहा है, निवेश कर रहा है, तकनीक अपना रहा है और दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास रखता है। विकसित भारत का संकल्प इसी आर्थिक सामर्थ्य को आगे बढ़ाने का संकल्प है। यही कारण है कि भारत आज वैश्विक परिदृश्य में अपनी भूमिका केवल राजनीतिक या कूटनीतिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक सशक्त आर्थिक शक्ति के रूप में भी स्थापित कर रहा है।

नई पीढ़ी : आकांक्षा से आत्मविश्वास तक

इस बदलते भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी है। आज की युवा पीढ़ी केवल नौकरी चाहने वाली पीढ़ी नहीं है। वह अपना उद्यम करना चाहती है, दुनिया के लिए नई तकनीक बनाना चाहती है, स्टार्टअप खड़ा करना चाहती है, अंतरिक्ष में जाना चाहती है और खेलों में दुनिया के सामने भारत का तिरंगा फहराना चाहती है। नरेंद्र मोदी जी ने इस आकांक्षा को समझा है। आज देश में स्टार्टअप्स हैं, इनोवेटिव आइडियाज हैं, स्पेस टेक्नोलॉजी है, खेलों में नई उपलब्धियाँ हैं। आइडिया से लेकर इनोवेशन तक भारत के इस बदलते स्वरूप में नरेंद्र मोदी जी की सोच और संकल्पना दिखाई पड़ती है। तकनीक के साथ कोई समझौता नहीं, शोध और आविष्कार से पीछे नहीं हटना और नई पीढ़ी के साथ संवाद करते रहना,यह नेतृत्व की उस क्षमता को दिखाता है जो भविष्य को केवल देखना नहीं, बल्कि उसके लिए आज से तैयारी करना चाहती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं

आर्थिक शक्ति के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा भी किसी राष्ट्र की ताकत का आधार है। नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में स्पष्ट संदेश गया कि भारत अपनी सुरक्षा के विषय में केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहेगा।सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और आपरेशन सिन्दूर जैसी आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति ने भारत की सुरक्षा नीति में दृढ़ता का संदेश दिया। आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान भी इसी संकल्प का हिस्सा है। वर्षों से चली आ रही इस चुनौती को समाप्त करने की दिशा में सरकार ने दृढ़ता के साथ काम किया है।राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं।यह नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व की स्पष्ट पहचान बनी है।

सत्ता को सेवा का उपकरण बनाना

नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है कि उन्होंने सत्ता को सेवा का उपकरण बनाने का प्रयास किया। गरीब के घर तक राशन पहुँचे, गरीब के सिर पर पक्का मकान हो, उसकी रसोई में गैस हो, उसके परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा मिले, वह बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े, स्वरोजगार के अवसर प्राप्त करे। इन सबको एक सेवा के रूप में मिशन मोड में चलाया गया। निःशुल्क राशन, पक्का मकान, पक्की रसोई, स्वास्थ्य बीमा, स्वरोजगार, वित्तीय समावेशन और शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव। इन सबको केवल सरकारी योजनाओं की सूची के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इनके पीछे एक सोच दिखाई देती है कि शासन का लाभ उस व्यक्ति तक पहुँचे जो सबसे पीछे है। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास। यह केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन की दिशा बताने वाला मंत्र बना। यहीं पर सत्ता और सेवा के बीच का अंतर समाप्त होता दिखाई देता है।

भारत का बढ़ता आत्मविश्वास

पच्चीस वर्षों की इस यात्रा को यदि किसी एक भाव में समेटना हो तो वह है- भारत के आत्मविश्वास में वृद्धि। आज भारत दुनिया के सामने अपनी बात अधिक मजबूती से रखता है। आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सजग है, नई तकनीक को अपना रहा है और अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ दुनिया के सामने खड़ा है। भू-राजनीतिक संकट के इस दौर में दुनिया भारत को एक ऐसे देश के रूप में देख रही है जो अपने हितों के साथ-साथ वैश्विक समस्याओं के समाधान में भी भूमिका निभा सकता है। यह आत्मविश्वास केवल सरकार या दिल्ली में दिखाई नहीं देता।यह उस गरीब के जीवन में दिखाई देता है जिसे पहली बार पक्का घर मिला यह उस युवा में दिखाई देता है जिसने अपना स्टार्टअप शुरू किया। यह उस खिलाड़ी में दिखाई देता है जो विश्व मंच पर भारत का तिरंगा लेकर खड़ा होता है। यह उस वैज्ञानिक में दिखाई देता है जो भारत के लिए नई उपलब्धि हासिल करता है।यही आत्मविश्वास आज के भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।

विकास के साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण 

किसी राष्ट्र का उत्थान केवल उसकी अर्थव्यवस्था से नहीं होता। उसके भीतर अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत के प्रति आत्मविश्वास भी होना चाहिए। दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के साथ-साथ भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में नरेंद्र मोदी जी का योगदान भी महत्वपूर्ण है। भारत की संस्कृति, योग, हमारी परंपराएँ, हमारी विरासत और हमारी सभ्यतागत सोच को दुनिया के सामने रखने का प्रयास अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आर्थिक रूप से मजबूत भारत और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी भारत। इन दोनों को साथ लेकर चलने की सोच इस नेतृत्व की विशेषता दिखाई देती है।

पच्चीस वर्षों की यात्रा का अर्थ

नरेंद्र मोदी जी के पच्चीस वर्षों को केवल सत्ता में रहने के वर्षों के रूप में देखना इस पूरी यात्रा को बहुत छोटा कर देना होगा। यह बदलते भारत के साथ चलने की यात्रा है। ढाई दशक में तकनीक बदली, परिस्थितियाँ बदलीं, सामाजिक चुनौतियाँ बदलीं, दुनिया की राजनीति बदली। लेकिन समय की आवश्यकता को समझकर अपने नेतृत्व को उसके अनुरूप ढालने की क्षमता बनी रही। यही कारण है कि हर दौर में नरेंद्र मोदी जी प्रासंगिक दिखाई देते हैं। एक ओर भारत आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में आत्मविश्वास के साथ खड़ा है। एक ओर नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को अवसर मिल रहे हैं, दूसरी ओर गरीब के जीवन में बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास हो रहा है। और इन सबके साथ भारत अपनी संस्कृति और अपनी पहचान के साथ दुनिया के सामने खड़ा है। भारत आज आत्मविश्वास के साथ उठ रहा है। विकसित भारत का संकल्प केवल सरकार का कार्यक्रम नहीं है। यह उस भारत की आकांक्षा है जो आर्थिक रूप से मजबूत हो, तकनीक में आगे हो, सुरक्षित हो, गरीब और कमजोर व्यक्ति को अवसर दे, अपनी संस्कृति पर गर्व करे और दुनिया में सम्मान के साथ खड़ा हो।नरेंद्र मोदी जी के पच्चीस वर्षों के सार्वजनिक जीवन को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। यह केवल एक नेता के पच्चीस वर्षों की यात्रा नहीं है।यह बदलते भारत, बढ़ते भारत और आत्मविश्वास के साथ खड़े होते भारत की भी यात्रा है।

 

Blog copy_3

अहिल्याबाई होलकर: सैन्य शिक्षा में नारी शक्ति की प्रेरणा

पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती पर उन्हें केवल एक आदर्श प्रशासक और धर्मसेवी शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सैन्य रणनीतिकार और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत के रूप में भी याद किया जाना चाहिए। वे न सिर्फ मंदिर, घाट और तालाब बनवाने वाली आदर्श रानी थीं, बल्कि अपने राज्य की रक्षा के लिए महिलाओं को आत्मरक्षा और युद्धकला में प्रशिक्षित करने वाली दूरदर्शी शासिका भी थीं।

अहिल्याबाई ने 1767 से 1795 तक मालवा पर शासन किया। पति खांडेराव और ससुर मल्हारराव की मृत्यु के बाद वे सत्ता में आईं और प्रशासन, न्याय और सामाजिक सुधारों के साथ महिलाओं की सैन्य भागीदारी की भी आधारशिला रखी। उस दौर में मालवा बार-बार युद्धों से प्रभावित था – मराठा-पठान संघर्ष, मराठा-मुगल झड़पें, और स्थानीय विद्रोह। इन परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने महिलाओं को तलवारबाजी, घुड़सवारी और भाला संचालन जैसे युद्धकौशल सिखाने के लिए शिविर लगाए।

मालवा की लोककथाएं और मराठी बाखरों में इन प्रयासों के उल्लेख मिलते हैं। नाथमाधव और के. ए. केलुसकर जैसे इतिहासकारों ने भी उनके शासन की सैन्य नीतियों में महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख किया है। यह परंपरा जीजाबाई और ताराबाई से प्रेरित थी, जिसे अहिल्याबाई ने आगे बढ़ाया।

मध्य भारत की भूमि रानी दुर्गावती, रानी अवंतीबाई और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं की गाथाओं से समृद्ध रही है। गोंड रानी कमलापति का भी युद्धक नेतृत्व 17वीं सदी में चर्चित रहा। आज स्वतंत्र भारत में महिलाओं की सैन्य भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2015 में पहली बार वायुसेना में महिला फाइटर पायलट की शुरुआत हुई। 2019 में भावना कंठ पहली महिला बनीं जिन्होंने फाइटर मिशन में योग्यता पाई। 2023 में ग्रुप कैप्टन शालिजा धामी ने फ्रंटलाइन यूनिट की कमान संभाली। 2021 में NDA के द्वार महिलाओं के लिए खुले, 2022 में नौसेना में पहली बार 273 महिला नाविक बनीं, और 2024 में 153 महिला अग्निवीर भारतीय वायुसेना में शामिल हुईं।

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के समय सेना की ओर से जब अधिकारी सोफिया कुरैशी और व्योमिका सिंह मीडिया के सामने आईं, तो पूरा देश गर्व से भर उठा। उनकी उपस्थिति ने साबित कर दिया कि आज की भारतीय सेना में न महिला होने की कोई बाधा है, न अस्वीकार्यता।

मध्यप्रदेश सरकार ने भी 2018 में पुलिस भर्ती में महिलाओं को 33% आरक्षण देकर पहल की, जिसे 2024 में बढ़ाकर 35% कर दिया गया। यह बदलाव केवल आंकड़ों में वृद्धि नहीं है, बल्कि महिलाओं को आत्मविश्वासी, जागरूक और सक्षम नागरिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

आज जब भारत सैन्य रूप से आत्मनिर्भर और वैश्विक मंच पर शक्तिशाली भूमिका में है, तब महिलाओं की रक्षा और सैन्य क्षेत्र में भागीदारी केवल समानता का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी अनिवार्य पहलू है। अहिल्याबाई जैसी ऐतिहासिक प्रेरणाओं से सीख लेकर हमें महिलाओं के सैन्य प्रशिक्षण को गति देनी चाहिए। इससे न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि समाज में स्त्री की भूमिका को नया गौरव भी मिलेगा।

महिलाओं की सैन्य शक्ति, भारत की आत्मशक्ति है — यही अहिल्याबाई की सच्ची प्रेरणा है ।

Blog copy_3

कम या ज्यादा मतदान से तय की जा सकती है किसी पार्टी की हार या जीत…? समझें सियासी गणित

सामान्य तौर पर कम मतदान का दोष राजनीतिक दलों पर लगा दिया जाता है. दरअसल, कम मतदान होना राजनीतिक दलों से ज्यादा समाज की सज्जन शक्ति और सामाजिक संगठनों को चुनौती है. राजनीतिक दल अपने हिस्से का मतदान कराने का भरसक प्रयास करते हैं. वे अपने प्रयास में कितने सफल हुए यह चुनाव परिणाम में स्पष्ट हो जाता है. कम मतदान का राजनीतिक विश्लेषक और राजनेता अपने अपने तर्कों से अपने अपने निष्कर्ष निकाल लेते हैं. कई बार ये निष्कर्ष सच्चाई से कोसों दूर भी होते हैं. मतदान की कम संख्या से कुछ लोग भाजपा के बारे में जरूर अपना निर्णय सुना देते हैं. क्या यह तथ्यात्मक है? या इसके पीछे मात्र कोई धारणा भर है?

 

तथ्यों के आलोक में मतदान
बीते चुनावों के आंकड़े देखेंगे तो हम समाज की समझ को पढ़ पाएंगे. आम लोकसभा चुनाव 2024 के दो चरणों में कम मतदान को लेकर हल्ला है. हालांकि यह मतदान कम मात्र 2019 की तुलना में ही है. पिछले लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में 2024 : 62.83 % (12 लोकसभा दोनों चरण) 2019 : 71.20 % , 2014 : 61.61 % , 2009 : 51.17 %, 2004 : 48.09 %, 1999 : 52.16 % मतदान हुआ. भारत के चुनावी इतिहास के अहम चुनाव आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में 51.96% मतदान हुआ. जिस चुनाव में अबतक की सर्वाधिक सीटे कांग्रेस ने प्राप्त की. जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, उसके बाद हुए चुनाव 1984 में भी 56.15 % मतदान हुआ था.

वहीं दूसरी ओर, विधानसभा चुनाव के परिणाम देखें तो कम या ज्यादा मतदान से दल विशेष की जीत या हार को जोड़ने का मिथक भी बेमानी लगता है. विधानसभा चुनाव में जिन पांच सीटों पर सर्वाधिक मतदान हुआ उनमें मात्र एक पर भाजपा जीती. वह सीट भी अधिक मतदान के क्रम में चौथे क्रमांक पर है. यदि सबसे कम मतदान वाली पांच सीटों पर नजर डालें तो दो सीटों पर भाजपा ने विजय प्राप्त की. संदेश स्पष्ट है कि क्षेत्र की तासीर, दल की बूथ पर पहुंच और उसका बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, प्रत्याशी का व्यक्तित्व और चुनावी व्यवहार मतदाताओं पर गहरा असर करता है. लोकसभा के दो चरणों के मतदान का बारीकी से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि भारतीय जनता पार्टी अपने मतदाताओं को बूथ तक ले जाने में बहुत हद तक सफल हो रही है.

मुद्दों की सकारात्मकता मतदाताओं की उदासीनता
राजनीति के विश्लेषक भरोसा करें ना करें लेकिन चुनावी परिणाम की यह विशेषता रही है कि मतदाता मुद्दों पर भी मतदान करता है. मुद्दा जाति और धर्म से जुड़ा हो सकता है या उसके दैनिक जीवन को प्रभाव डालने वाले रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़ा भी हो सकता है. पिछले दो लोकसभा चुनाव की तरह ही यह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के चुंबकीय नेतृत्व से प्रभावित है. यह भी समझना होगा कि मोदी जी का नेतृत्व या उनकी गारंटी यूं ही मुद्दा नहीं बन गई. भाजपा की विचारधारा, रीति नीति, संगठन तंत्र की शक्ति में रचे बसे मोदी जी ने आम आदमी के सपनों को साकार किया है. चाहे वह गरीब और मध्यम वर्ग का मकान हो या श्री रामलला का मंदिर. चाहे 80 करोड़ लोगों को निशुल्क राशन हो या दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था. चाहे चंद्रयान, आदित्य एल वन की सफलता हो या आधुनिक रेल से लेकर मजबूत एवं चौड़ी सड़कों की उपलब्धता हो. यह मतदाताओं ने देखा है. राष्ट्रीय चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे प्रभावी होते हैं. इन मुद्दों पर जैसे सुरक्षा, समृद्धि, बुनियादी ढांचागत सुविधाएं, विज्ञान और तकनीक इन सभी मुद्दों पर दुनिया में भारत की साख और धाक उसके मन को गदगद करती हैं. वह मोदी जी से एकात्म हो गया है.

Blog copy_5

1942 के द्रोही वामपंथियों की शकुनि बुद्धि से संचालित है कांग्रेस दोनों स्वतंत्रता संग्राम के तथ्यों से सतत खिलवाड़ करते रहे

देश स्वतंत्रता की 75वी वर्षगांठ मना रहा है। अमृत महोत्सव की बेला पर भारत छोड़ो आंदोलन के प्रसंग में तथ्यों को उकेरना समय की जरूरत है। ये अवसर आजादी के संघर्ष और संघर्ष के उन मूल्यों को स्मरण कर भारत के पुनर्निर्माण में गतिमान होना का है। कांग्रेस इस अमूल्य विरासत को सहेज और संवार कर नई पीढ़ी से साँझा करने की बजाय भारत छोडो आंदोलन के द्रोही वामपंथियों की शकुनि बुद्धि से संचालित हो रही है। काँग्रेस ने नेहरू वंश के अलावा तमाम महापुरुषों और क्रांतिकारियों के साथ अपमानजनक भेदभावपूर्ण व्यवहार किया। आजादी के इतिहास के साथ छेड़छाड़ की।

आजादी के आंदोलन में लाखों अनाम ऐसे लोग थे,जो न अपना नाम इतिहास के पन्नो पर, न पत्थरों पर उकेरना चाहते थे। इसी भावना के साथ 1925 में जन्मे संघ के स्वयंसेवक कल भी थे, आज भी हैं। ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग ने 1943 के अंत में संघ के विषय में जो रपट प्रस्तुत की, वह राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है। जिसमें सिद्ध किया है कि संघ योजना पूर्वक स्वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ़ा।

चतुर्थ संघचालक पूज्य रज्जु भैया जी ने भारत छोड़ो आंदोलन में प्रयाग में आंदोलन किया था। संघ द्वारा 1942 के आंदोलन में माननीय दतोपन्त ठेंगड़ी जी सहित अनेको प्रमुख संघ नेताओ को आंदोलन के लिये भेजा गया था।

दरअसल आजादी के बाद लगातार बौद्धिक दिवालिया कांग्रेस को वामपंथियों ने गोद ले लिया और न केवल इतिहास से छेड़छाड़ की बल्कि देशज विचार व् सांस्कृतिक विरासत को भुलाया गया। महापुरुषों के साथ भेदभाव किया गया। इन वामपंथियों के मार्ग पर कांग्रेसी गौरव करने लगे।

वामपंथियों ने सुभाषचंद्र बोस के लिए ”तोजो का कुत्ता”जैसे शब्द इस्तेमाल किए थे. क्योंकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के लिए जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री तोजो की सहायता ली थी. भगत सिंह को आतंकवादी, शिवाजी को पहाड़ी चूहा बताने वाले आजादी के बाद भी वामपंथी लेखकों को कांग्रेस सरकारें पढ़ाती रहीं। साथ ही साथ इतिहास इस बात का गवाह है कि कम्युनिस्टों ने 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजों का साथ देते हुए देशवासियों के साथ विश्वासघात किया था. तब वामपंथी और लाल सलाम वालों को गुलाम देश अच्छा लग रहा था. गांधी जी और सुभाष जी देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे वहीँ यह लोग अंग्रेजों का साथ दे रहे थे.

Blog copy_1

“भारतीयता पर हमलावरों के एकीकरण का उपक्रम भारत जोड़ो यात्रा ” – रजनीश अग्रवाल

स्वतंत्र भारत की राजनीति, राजनीतिक कार्यक्रम व गतिविधियां कैसी हो इस बारे में जितना चिंतन और उसका क्रियान्वयन होना था,कमोवेश वह नहीं हो पाया। छह दशक से ज्यादा लगातार कांग्रेस सत्ता में बने रहने के कारण राजनीति का भी कांग्रेसीकरण हो गया। जैसी कांग्रेस होती गई वैसे ही राजनीति की चाल ढाल बनती गई ।

राजनीति में होने के मायने कांग्रेस जैसा होना हो गया । अगर आप सत्ता में हैं तो कांग्रेस नेता जैसा आपका रसूख सरकारी दफ्तरों में होना चाहिए। आपने जो चाहा वैसा निर्णय होना चाहिए। चलना-फिरना,कुर्ता पजामा, गमछा और अब तो गाड़ी,मोबाइल,चश्मा सब कुछ मापदण्ड बन गए। उदाहरण बन गए। गाड़ी बंगला आपकी नौकरी व्यवसाय के आधार पर नहीं राजनीति में पद के आधार पर तौले जाने लगे।

शरद जोशी जी का लिखा व्यंग्य उदाहरण बन गया कि” ..एक दिन सबको कांग्रेस हो जाना है।” हालांकि मैं शरद जोशी जी के व्यंग्य से कभी सहमत नहीं हुआ। उस समय के हालात के अनुसार भविष्य का आकलन उसी तरह सोच कर किया जा सकता था, जैसा उन्होंने किया।
उससमय कोई नहीं सोच सकता था कि देशज राजनीति और देश के चिंतन के आधार पर कोई दल चल-बढ़ सकता है। बहुमत की दम पर लगातार सरकार में कोई दल रहकर अपनी देशी सोच को पुनर्स्थापित कर सकता है।

आज जब समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुआ-बावड़ी, तालाब की गंदी की भरे दृश्य फिर साफ करते भाजपा कार्यकर्ता और उसके बाद में स्वच्छ हमारे जल स्रोत दिखते हैं तो राजनीतिक दल होने के मायने समाज को समझ आते हैं। प्लास्टिक बीनना, झाड़ू लगाना, फावड़ा चलाना यह उपक्रम मात्र एक कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह पूरी अवधारणा है। इसे लखदख झकाझक कुर्ता पजामा पहनकर तो नहीं कर सकता। उसे अपने बनाये हुए आवरण को त्यागना होता है। उन जैसा बन जाना होता है जो नित्य यही सेवा करते आ रहे हैं। उनसे जुड़कर पूरे समाज के प्रति एकात्म भाव बनने लगता है। डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी की वैचारिक संकल्पना और प . दीनदयाल उपाध्याय जी की संगठन सेवा साधना अब सच्चे अर्थों में साकार रूप ले रही है। भाजपा अब सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन का उपकरण बनने के साथ ही राजनीति के भारतीयकरण में नेतृत्व कर अपने होने के सही उद्देश्य सिद्ध कर रही है।

पर्यावरण के प्रति चेतना का जागरण नारों और भाषणों से नहीं बल्कि सुरक्षित वृक्षारोपण, जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन ,प्लास्टिक से मुक्ति से करने के लिए अपना श्रमदान जब सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता करते हैं तो निसंदेह समाज में राजनीति में होने के मायने संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ते हैं।
भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने लगातार सरकार में आने के बाद स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दल की अवधारणा को सिद्ध करने के लिए तमाम उपक्रम अभियान शुद्ध करने का काम भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा किया है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा जी के मार्गदर्शन में ना केवल कोरोना काल में सेवा ही संगठन -2 बल्कि 21 जून योग दिवस से लेकर 23 जुलाई डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि और 6 जुलाई उनकी जन्म जयंती तक इस प्रकार की विशिष्ट कार्यक्रम की संकल्पना यथार्थ में परिणीत किये हैं।

Blog copy_5

स्वतंत्र भारत के राजनीति की अवधारणा सिद्ध करती भाजपा

स्वतंत्र भारत की राजनीति, राजनीतिक कार्यक्रम व गतिविधियां कैसी हो इस बारे में जितना चिंतन और उसका क्रियान्वयन होना था,कमोवेश वह नहीं हो पाया। छह दशक से ज्यादा लगातार कांग्रेस सत्ता में बने रहने के कारण राजनीति का भी कांग्रेसीकरण हो गया। जैसी कांग्रेस होती गई वैसे ही राजनीति की चाल ढाल बनती गई।

राजनीति में होने के मायने कांग्रेस जैसा होना हो गया । अगर आप सत्ता में हैं तो कांग्रेस नेता जैसा आपका रसूख सरकारी दफ्तरों में होना चाहिए। आपने जो चाहा वैसा निर्णय होना चाहिए।

चलना-फिरना, कुर्ता पजामा, गमछा और अब तो गाड़ी, मोबाइल, चश्मा सब कुछ मापदण्ड बन गए। उदाहरण बन गए। गाड़ी बंगला आपकी नौकरी व्यवसाय के आधार पर नहीं राजनीति में पद के आधार पर तौले जाने लगे।
शरद जोशी जी का लिखा व्यंग्य उदाहरण बन गया कि” ..एक दिन सबको कांग्रेस हो जाना है।” हालांकि मैं शरद जोशी जी के व्यंग्य से कभी सहमत नहीं हुआ। उस समय के हालात के अनुसार भविष्य का आकलन उसी तरह सोच कर किया जा सकता था, जैसा उन्होंने किया।

उस समय कोई नहीं सोच सकता था कि देश राजनीति और देश के चिंतन के आधार पर कोई दल चल-बढ़ सकता है। बहुमत की दम पर लगातार सरकार में कोई दल रहकर अपनी देशी सोच को पुनर्स्थापित कर सकता है।

आज जब समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुआ-बावड़ी, तालाब की गंदी की भरे दृश्य फिर साफ करते भाजपा कार्यकर्ता और उसके बाद में स्वच्छ हमारे जल स्रोत दिखते हैं तो राजनीतिक दल होने के मायने समाज को समझ आते हैं। प्लास्टिक बीनना, झाड़ू लगाना, फावड़ा चलाना यह उपक्रम मात्र एक कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह पूरी अवधारणा है। इसे लखदख झकाझक कुर्ता पजामा पहनकर तो नहीं कर सकता। उसे अपने बनाये हुए आवरण को त्यागना होता है। उन जैसा बन जाना होता है जो नित्य यही सेवा करते आ रहे हैं। उनसे जुड़कर पूरे समाज के प्रति एकात्म भाव बनने लगता है। डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी की वैचारिक संकल्पना और प . दीनदयाल उपाध्याय जी की संगठन सेवा साधना अब सच्चे अर्थों में साकार रूप ले रही है। भाजपा अब सामाजिक व आर्थिक परिवर्तन का उपकरण बनने के साथ ही राजनीति के भारतीयकरण में नेतृत्व कर अपने होने के सही उद्देश्य सिद्ध कर रही है।

पर्यावरण के प्रति चेतना का जागरण नारों और भाषणों से नहीं बल्कि सुरक्षित वृक्षारोपण, जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन ,प्लास्टिक से मुक्ति से करने के लिए अपना श्रमदान जब सत्तारूढ़ भाजपा के कार्यकर्ता करते हैं तो निसंदेह समाज में राजनीति में होने के मायने संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने लगातार सरकार में आने के बाद स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दल की अवधारणा को सिद्ध करने के लिए तमाम उपक्रम अभियान शुद्ध करने का काम भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा किया है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा जी के मार्गदर्शन में ना केवल कोरोना काल में सेवा ही संगठन -2 बल्कि 21 जून योग दिवस से लेकर 23 जुलाई डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि और 6 जुलाई उनकी जन्म जयंती तक इस प्रकार की विशिष्ट कार्यक्रम की संकल्पना यथार्थ में परिणीत किये हैं।