सामान्य तौर पर कम मतदान का दोष राजनीतिक दलों पर लगा दिया जाता है. दरअसल, कम मतदान होना राजनीतिक दलों से ज्यादा समाज की सज्जन शक्ति और सामाजिक संगठनों को चुनौती है. राजनीतिक दल अपने हिस्से का मतदान कराने का भरसक प्रयास करते हैं. वे अपने प्रयास में कितने सफल हुए यह चुनाव परिणाम में स्पष्ट हो जाता है. कम मतदान का राजनीतिक विश्लेषक और राजनेता अपने अपने तर्कों से अपने अपने निष्कर्ष निकाल लेते हैं. कई बार ये निष्कर्ष सच्चाई से कोसों दूर भी होते हैं. मतदान की कम संख्या से कुछ लोग भाजपा के बारे में जरूर अपना निर्णय सुना देते हैं. क्या यह तथ्यात्मक है? या इसके पीछे मात्र कोई धारणा भर है?
तथ्यों के आलोक में मतदान
बीते चुनावों के आंकड़े देखेंगे तो हम समाज की समझ को पढ़ पाएंगे. आम लोकसभा चुनाव 2024 के दो चरणों में कम मतदान को लेकर हल्ला है. हालांकि यह मतदान कम मात्र 2019 की तुलना में ही है. पिछले लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में 2024 : 62.83 % (12 लोकसभा दोनों चरण) 2019 : 71.20 % , 2014 : 61.61 % , 2009 : 51.17 %, 2004 : 48.09 %, 1999 : 52.16 % मतदान हुआ. भारत के चुनावी इतिहास के अहम चुनाव आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में 51.96% मतदान हुआ. जिस चुनाव में अबतक की सर्वाधिक सीटे कांग्रेस ने प्राप्त की. जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, उसके बाद हुए चुनाव 1984 में भी 56.15 % मतदान हुआ था.
वहीं दूसरी ओर, विधानसभा चुनाव के परिणाम देखें तो कम या ज्यादा मतदान से दल विशेष की जीत या हार को जोड़ने का मिथक भी बेमानी लगता है. विधानसभा चुनाव में जिन पांच सीटों पर सर्वाधिक मतदान हुआ उनमें मात्र एक पर भाजपा जीती. वह सीट भी अधिक मतदान के क्रम में चौथे क्रमांक पर है. यदि सबसे कम मतदान वाली पांच सीटों पर नजर डालें तो दो सीटों पर भाजपा ने विजय प्राप्त की. संदेश स्पष्ट है कि क्षेत्र की तासीर, दल की बूथ पर पहुंच और उसका बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, प्रत्याशी का व्यक्तित्व और चुनावी व्यवहार मतदाताओं पर गहरा असर करता है. लोकसभा के दो चरणों के मतदान का बारीकी से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि भारतीय जनता पार्टी अपने मतदाताओं को बूथ तक ले जाने में बहुत हद तक सफल हो रही है.
मुद्दों की सकारात्मकता मतदाताओं की उदासीनता
राजनीति के विश्लेषक भरोसा करें ना करें लेकिन चुनावी परिणाम की यह विशेषता रही है कि मतदाता मुद्दों पर भी मतदान करता है. मुद्दा जाति और धर्म से जुड़ा हो सकता है या उसके दैनिक जीवन को प्रभाव डालने वाले रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़ा भी हो सकता है. पिछले दो लोकसभा चुनाव की तरह ही यह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के चुंबकीय नेतृत्व से प्रभावित है. यह भी समझना होगा कि मोदी जी का नेतृत्व या उनकी गारंटी यूं ही मुद्दा नहीं बन गई. भाजपा की विचारधारा, रीति नीति, संगठन तंत्र की शक्ति में रचे बसे मोदी जी ने आम आदमी के सपनों को साकार किया है. चाहे वह गरीब और मध्यम वर्ग का मकान हो या श्री रामलला का मंदिर. चाहे 80 करोड़ लोगों को निशुल्क राशन हो या दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था. चाहे चंद्रयान, आदित्य एल वन की सफलता हो या आधुनिक रेल से लेकर मजबूत एवं चौड़ी सड़कों की उपलब्धता हो. यह मतदाताओं ने देखा है. राष्ट्रीय चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे प्रभावी होते हैं. इन मुद्दों पर जैसे सुरक्षा, समृद्धि, बुनियादी ढांचागत सुविधाएं, विज्ञान और तकनीक इन सभी मुद्दों पर दुनिया में भारत की साख और धाक उसके मन को गदगद करती हैं. वह मोदी जी से एकात्म हो गया है.

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